हरिजन के बल होत है , जाको हरी के संग !विपत्ति पड़े बिसरे नहीं , चढ़े चौगुना रंग ! अर्थ - भगवान के भक्त को बल होता है उनको किसी संसारी का संग नहीं होता , बल्कि केवल हरि का ही संग रहता है ! इसिलिए विपत्ति पड़ने पर भी भगवान नहीं भूलते है और उस बक्त सन्त पर चौगुना भक्ति का रंग चढ़ जाता है ! भाव यह है कि भक्त को चाहिए कि अकेला रहकर भगवान को भजे , उपद्रव होने पर भी वह टसमस न हो , फिर उस पर चौगुना ज्ञान - भक्ति का रंग चढ़ जाता है ! वह सन्त संसार में धन्य और दुर्लभ है ! आपा तजि हरि को भजे . नख सिख तजे विकार. सब जीवन निर्भय रहे , साधु मता यह सार “ अर्थ - आपा अथार्त अनात्म - बस्तुओं को अपने विवेक से त्याग कर दें और अनिवारच्य - तत्व भगवान को भजें ! नख से शिखा तक जो प्राकृतिक विकार है , उनको निर्मूल करके त्याग दें ! समस्त जगजीवों से निर्भय होकर रहें! किसी प्राणी से भय नहीं मानें ! यह साधुओं का सार मत है अर्थात यह साधु मत सार है ! भाव यह है कि अनात्म को अपने शुद्धरूप से हटाकर अपने चेतनरूप से नि:तत्व नाम को भजें काम क्रोध आदि विकारो को त्याग दें ! प्रभु...