हरिजन के बल होत है , जाको हरी के संग !विपत्ति पड़े बिसरे नहीं,
चढ़े चौगुना रंग ! ![]()
अर्थ - भगवान के भक्त को बल होता है उनको किसी संसारी का संग नहीं
होता , बल्कि केवल हरि का ही संग रहता है ! इसिलिए विपत्ति पड़ने पर भी भगवान
नहीं भूलते है और उस बक्त सन्त पर चौगुना भक्ति का रंग चढ़ जाता है ! भाव यह है कि
भक्त को चाहिए कि अकेला रहकर भगवान को भजे, उपद्रव
होने पर भी वह टसमस न हो , फिर उस पर चौगुना ज्ञान - भक्ति का रंग चढ़ जाता है ! वह सन्त संसार में धन्य और
दुर्लभ है !
अर्थ - आपा अथार्त अनात्म
- बस्तुओं को अपने विवेक से त्याग कर दें और अनिवारच्य - तत्व भगवान को भजें ! नख
से शिखा तक जो प्राकृतिक विकार है , उनको निर्मूल करके त्याग दें ! समस्त जगजीवों से निर्भय होकर रहें! किसी
प्राणी से भय नहीं मानें ! यह साधुओं का सार मत है अर्थात यह साधु मत सार है ! भाव
यह है कि अनात्म को अपने शुद्धरूप से हटाकर अपने चेतनरूप से नि:तत्व नाम को भजें
काम क्रोध आदि विकारो को त्याग दें ! प्रभु का जीव समझकर सबसे निर्भय
रहें , यह संतों का सार-
सिद्धांत है
देखो
सब में नाम है , एक ही रस भर पूर !
जैसे
ऊख से सब बने , चीनी शक्कर गुड़ !!
अर्थ - नाम सारशब्द सब में ब्यापक है , उसको तुम ज्ञानचक्षु से देखो एवं गुरु युक्ति
से देखो !
वह समस्त चराचर जगत में एकरस , भरपूर पूर्ण व्याप्त है ! बह नाम अनिवाच्य -
तत्व अनुभवगम्य है ! जिस प्रकार ऊख से चीनी , शक्कर
, गुड़ सब कुछ बनता है , उसी प्रकार उस नाम से सब कुछ बनता है ! भाव यह
है की नाम नित्य , कूटस्थ रूप है !
उसका कार्य - परिणाम नहीं होता , पर उच्च - उच्च विभूतियाँ जितनी है , उसी नाम की है एवं जो कुछ उत्तम प्रतिभाएं है , उसी नाम की है ! नाम संतो का जीवन - प्राण है !
जीवन आधार है एवं जीवों का अन्तर - प्रकाश है ! आत्मा का अंतरात्मा , अंतर्यामी अमृत है ! जगताप से पीड़ित जीव उसी
नाम के आश्रय ले , शांति प्राप्त करते है ! पीड़ित जीवों का
विश्राम - स्थान नाम ही है, उस नाम को गुरु
द्वारा जानें !
साहेब कहते है कि जब तक जगत का नाता सम्बन्ध रहता है , तब
तक भक्ति नहीं होती , न तो हो सकती है ! जगत के नाता को पूर्ण
ज्ञानबल से जब तोड़ देता है , तभी भक्ति होती है और भक्त कहलाता है ! भाव यह
कि जगत के नाता में अध्यात्म विरुद्ध व्यवहार चलता है , जो
आत्म उत्थान का बाधक है ! अतः जग - भ्रमजाल है , अन्य नामधारी भक्त नहीं है !.